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जहां जाने की खबर से ही कांप जाती थी रूह, वहां पहुंचे PM मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को अंडमान-निकोबार पहुंचे, जहां वो उस जेल में भी गए जहां की सजा को कालापानी की सजा के नाम से जाना जाता था. इस दौरान मोदी उस कोठरी में भी गए, जहां वीर सावरकर को रखा गया था. ऐसे में जानते हैं ये जेल अंदर से कैसी है और इसमें किस तरह की यातनाएं दी जाती थीं. बता दें कि पोर्ट ब्लेयर में सेलुलर जेल नाम की इस जेल में भारत की आजादी के लिए लड़ रहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को कड़ी से कड़ी यातनाएं देने के लिए रखा जाता था.


जहां जाने की खबर से ही कांप जाती थी रूह, वहां पहुंचे PM मोदी

अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति के बाद इस जेल का निर्माण करवाया था और इस जेल में अंग्रेजों के शासन के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों को आम जनता से दूर रखा जाता था. इसलिए इस जेल का निर्माण भारत से अलग अंडमान में किया गया. कहा जाता है कि जब अंग्रेजों के खिलाफ लोगों ने अपनी आवाज बुलंद करना शुरू कर दी थी तो 1896 में इसका निर्माण कार्य शुरू किया और 1906 में यह बनकर तैयार हो गई थी. उस दौरान जिस क्रांतिकारी को इस जेल में भेजा जाता था, उसे ही कालापानी की सजा कहा जाता था.

इसे कालापानी की सजा कहने का कारण यह था कि यह जेल भारत की मुख्य भूमि से हजारों किलोमीटर दूर स्थित थी. राजधानी पोर्ट ब्लेयर में जिस जगह पर यह जेल बनी हुई थी उसके चारों ओर पानी ही पानी भरा रहता था क्योंकि यह पूरा क्षेत्र बंगाल की खाड़ी के अंतर्गत आता है. इस जेल में 696 सेल बनाई गई थी और हर सेल का साइज 4.5 मीटर x 2.7 मीटर था. इसमें खिड़कियां नीचे थी, लेकिन कैदी चाहकर भी इस जेल से बाहर नहीं जा सकता था. इसका मुख्य भवन लाल इटों से बना है, ये ईंटें बर्मा से यहाँ लाई गई थीं जो कि आज म्यांमार के नाम से जाना जाता है.

इस जेल में हर कैदी को एक-दूसरे से अलग रखा जाता था. इस जेल में बंद क्रांतिकारियों पर बहुत जुल्म ढाया जाता था. क्रांतिकारियों से कोल्हू से तेल पेरने का काम करवाया जाता था. बता दें कि कोठरी में एक लकड़ी का बिस्तर, कंबर, लोक की प्लेट और मिट्टा का बर्तन रखने की ही अनुमति होती थी और शौचालय इस्तेमाल करने का भी एक समय तय होता था.

कहा जाता है कि हर कैदी को नारियल और सरसों को पेरना होता था. यदि वह ऐसा नहीं कर पाता था तो उन्हें बुरी तरह से पीटा जाता था और बेडियों से जकड़ दिया जाता था. कई कैदियों की यह काम करते वक्त ही मौत हो गई थी. इस जेल में बटुकेश्वर दत्त, वीर सावरकर, बाबूराव सावरकर आदि लोगों ने सजा काटी है. सेल्यूलर जेल की दीवारों पर वीर शहीदों के नाम लिखे हैं. यहां एक संग्रहालय भी है जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है जिनसे स्वतंत्रता सैनानियों पर अत्याचार किए जाते थे.
जेल में बंद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को बेड़ियों से बांधा जाता था. काला पानी जेल में भारत से लेकर बर्मा तक के लोगों को कैद में रखा गया था. एक बार यहां 238 कैदियों ने भागने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया. एक कैदी ने तो आत्महत्या कर ली और बाकी पकड़े गए. भारत को आजादी मिलने के बाद इसकी दो और शाखाओं को ध्वस्त कर दिया गया.शेष बची तीन शाखाएं और मुख्य टावर को 1969 में राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया.
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