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देवरिया बालिका गृह की कहानी पड़ोसियों की ज़ुबानी

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The story of Deoria Balika Ghar's neighbors
उत्तर प्रदेश में देवरिया ज़िले के बालिका संरक्षण गृह में बच्चियों के साथ हो रहे कथित यौन शोषण मामले में सरकार ने कार्रवाई करते हुए ज़िलाधिकारी को हटा दिया है. कुछ अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की गई है. बाल संरक्षण गृह चलाने वाले दो लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि आख़िर एक अवैध संरक्षण गृह में ख़ुद पुलिसकर्मी लड़कियों को छोड़ने के लिए क्यों आते थे?


देवरिया रेलवे स्टेशन से महज़ कुछ 100 मीटर की दूरी पर एक पुरानी इमारत की पहली मंज़िल पर बने इस संरक्षण गृह को फ़िलहाल सील कर दिया गया है. वहां के कर्मचारी भाग गए हैं या फिर भगा दिए गए हैं. आस-पास के लोग इस बात से हैरान हैं कि उनकी ‘नाक के नीचे’ ये सब हो रहा था और उन्हें ख़बर तक नहीं थी.

सकते में स्थानीय लोग

जिस इमारत की ऊपरी मंज़िल पर मां विंध्यवासिनी बालिका संरक्षण गृह है, उसी इमारत के ग्राउंड फ़्लोर पर केपी पांडेय की स्टेशनरी की दुकान है और एक प्रिंटिंग प्रेस भी. इमारत के पिछले हिस्से के ठीक सामने उनका पुश्तैनी घर है.


केपी पांडेय बताते हैं, “हम लोगों को तो इस बात का कोई अंदेशा भी नहीं था कि यहां ये सब हो रहा है. पुलिसवाले लड़कियों को छोड़ने आते थे, उन्हें ले जाते थे यहां तक कि लड़कियां स्कूल भी जाती थीं और कई बार तो हमने उन्हें पिकनिक मनाने के लिए भी जाते हुए देखा है.”

The story of Deoria Balika Ghar's neighbors-2

केपी पांडेय बताते हैं कि गिरिजा त्रिपाठी की ये संस्था तो काफ़ी पुरानी है, लेकिन आठ साल पहले उन्होंने ऊपरी हिस्से को किराए पर लेकर ये बालिका संरक्षण गृह खोला था. उनके मुताबिक़ दिन में तो यहां उन्हें कोई आपत्तिजनक हरकत नहीं दिखी, बाद में क्या होता था, उसके बारे में उन्हें कोई ख़बर नहीं है.


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वहीं पड़ोस में ही रहने वाले मणिशंकर मिश्र कहते हैं कि गिरिजा त्रिपाठी और उनके पति बालगृह के अलावा परिवार परामर्श केंद्र भी चलाते थे और उनके मुताबिक़ इन लोगों ने कई परिवारों को आपस में मिलाने का भी काम किया है. इसके अलावा इनके पास लोग शादी-विवाह के मामले में भी सलाह लेने आते थे.

करोड़ों की मालिक हैं गिरिजा त्रिपाठी

मणिशंकर मिश्र दावा करते हैं कि चीनी मिल में मामूली नौकरी करने वाले गिरिजा त्रिपाठी के पति आज करोड़ों की दौलत के मालिक हैं और इसी तरह के कई संस्थान चला रहे हैं. बावजूद इसके मणिशंकर मिश्र गिरिजा त्रिपाठी का बचाव भी करते हैं, “ये लोग बच्चियों को गोद भी देते थे, उनकी शादी भी कराते थे. जिन 18 लड़कियों के ग़ायब होने की बात की जा रही है, हो सकता है कि उन्हें ऐसी जगहों पर ही पहुंचाया गया हो. यदि ऐसा हुआ तो ये बच भी सकती हैं.”


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पड़ोसियों का ये भी कहना है कि यहां अक्सर रसूखदार लोग आते थे और गिरिजा त्रिपाठी को भी शहर के कई कार्यक्रमों में अतिथि के तौर पर बुलाया जाता था. दरअसल, यहां उनकी पहचान एक समाजसेवी की रही है, कई सरकारी संस्थाओं के वो मानद सदस्य हैं, तमाम प्रतिष्ठित लोगों के साथ उनकी तस्वीरें भी हैं. ये अलग बात है कि जिन लोगों के साथ उनकी तस्वीरें थीं, वो अब ख़ुद का बचाव करते फिर रहे हैं. इस बालिका संरक्षण गृह के संचालन, उस पर हुई कार्रवाई और मान्यता रद्द होने के बावजूद इसके अबाध संचालन के मामले में घोर प्रशासनिक लापरवाही और मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं. आलम ये है कि मान्यता रद्द करने का आदेश हुए एक साल से ज़्यादा हो गया है, लेकिन संरक्षण गृह की दीवारों पर ‘उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता प्राप्त’ का बोर्ड जगह-जगह अभी भी लगा हुआ है.

एक साल बाद एफ़आईआर

अनियमितता की शिकायतें मिलने के बाद पिछले साल 23 जून को संस्था की संचालक गिरिजा त्रिपाठी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे, जबकि ज़िला प्रशासन ने एक साल बाद 30 जुलाई 2018 को एफ़आईआर दर्ज कराई. इस दौरान पूरे साल भर शासन स्तर पर अधिकारी नोटिस भेजते रहे, लेकिन ये जानने की कोशिश नहीं की गई कि नोटिस पर कार्रवाई क्या हुई है. ख़ुद महिला एवं बाल विकास मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने भी इस बात को स्वीकार किया है.


पिछले साल राज्य भर में सचल पालना गृहों के संचालन में बड़े पैमाने पर धांधली और अनियमितता की शिकायतें मिलने के बाद ऐसी सभी संस्थाओं की जांच सीबीआई से कराई गई थी. जांच के दायरे में देवरिया की ये संस्था भी थी. इस संस्था में भारी अनियमितता पाई गई. अधिकारियों के मुताबिक उस वक़्त भी यहां बच्चे पंजीकृत संख्या से कम मिले थे.

मान्यता रद्द होने के बाद भी हो रहा था संचालन

इसी वजह से संस्था की मान्यता ख़त्म कर दी गई थी. बावजूद इसके संस्था का संचालन बदस्तूर जारी रहा, ज़िला प्रशासन न सिर्फ़ मूकदर्शक बना रहा बल्कि आरोप ये भी है कि पुलिसकर्मी ख़ुद लड़कियों को यहां लाकर पहुंचाते थे. यही नहीं, महिला एवं बाल विकास विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक़ शासन स्तर पर संस्था को बंद करके वहां रहने वाली किशोरियों को किसी दूसरी संस्था में शिफ़्ट करने का आदेश दिया गया था, लेकिन अपने रसूखदार संबंधों और पहुंच के ज़रिए गिरिजा त्रिपाठी ऐसा न होने देने में कामयाब रहीं.


पड़ोस में ही रहने वाले एक अन्य व्यक्ति ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि क़रीब एक हफ़्ते पहले ज़िला प्रोबेशन अधिकारी यहां आए थे और बालिका गृह की अधीक्षक और मौजूद अन्य लोगों से विवाद भी हुआ था. इनके मुताबिक, रविवार को संस्था में कथित देह व्यापार की बात इसी घटना के बाद सामने आई है. वो कहते हैं कि अब दोनों घटनाओं में कोई समानता है या नहीं, वे नहीं जानते, लेकिन ऐसा हुआ था.

हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों का ये भी कहना है कि संस्था की संचालक गिरिजा त्रिपाठी ने कोर्ट के झूठे स्थगन आदेश की आड़ लेकर प्रशासन को भ्रम में रखा और कार्रवाई से बचती रहीं, लेकिन इस बारे में आधिकारिक तौर पर बयान देने के लिए कोई भी अधिकारी तैयार नहीं है. जहां तक सवाल बालिका संरक्षण गृह में रहने वाली लड़कियों के रहन-सहन और उनके साथ होने वाले बर्ताव का है तो, आस-पड़ोस का कोई भी व्यक्ति इस बारे में न तो संस्था और न ही उसके संचालन में शामिल लोगों के बारे में कोई प्रतिकूल टिप्पणी करता है. केपी पांडेय कहते हैं, “मैं ख़ुद एक ऐसी संस्था से जुड़ा हूं जो किसी भी तरह की अवैध और अनैतिक गतिविधियों पर निगरानी रखती है. यदि ऐसा कुछ कभी हमने सुना होता या देखा होता तो हम संदेह ज़रूर करते.”


पड़ोस में ही कपड़े की दुकान चलाने वाले राकेश मौर्य भी इस घटना से हतप्रभ दिखे तो इमारत के पीछे रहने वाले दिलीप शर्मा कहने लगे, “ख़ुद पुलिसवाले विश्वास के साथ लड़कियों को यहां सुरक्षित रहने के लिए छोड़ने आते थे. कई बड़े अधिकारी आते थे और हम लोग भी देखते थे कि यहां जो हो रहा है उसमें कुछ ग़लत नहीं हो रहा है. हां, ये ज़रूर है कि सुबह या देर रात कुछ लक्ज़री गाड़ियां ज़रूर आती थीं, लेकिन उन गाड़ियों में कौन आता था, कौन जाता था, ये हमें नहीं मालूम.” दिलीप शर्मा कहते हैं कि क़रीब दो साल पहले उनके घर के पास ही एक शराब की दुकान खुल गई, इसलिए हो सकता है कि इन गाड़ियों पर आने वाले लोग शराब की दुकान पर ही आते हों.
हालांकि दिलीप शर्मा ये भी कहते हैं कि जिस दिन संस्था में छापा पड़ा है, उसके बाद उन्होंने इन गाड़ियों को नहीं देखा. बालिका संरक्षण गृह को फ़िलहाल सील कर दिया गया है और कुछेक पुलिसकर्मियों को आस-पास निगरानी और सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है. वहां मौजूद कुछ लोग ये भी बताते मिले कि संस्था में सब ठीक हो रहा था, ऐसा भी नहीं है. एक बुज़ुर्ग व्यक्ति कहने लगे कि उनके पास कोई सुबूत तो नहीं है, लेकिन उन्हें ये पता है कि पुलिस-प्रशासन के अफसरों को कई बार पत्र लिखकर संस्था को बंद कराने की मांग की गई. उनका कहना था, “शिकायत के बावजूद बजाए कोई कार्रवाई करने के, पुलिस गुमशुदा और घर से भागी लड़कियों को बरामदगी के बाद इसी केंद्र में लाकर छोड़ जाती थी. अब या तो पुलिस को किसी और संरक्षण गृह की जानकारी नहीं थी, यहां छोड़ने में उन्हें कोई फ़ायदा था या फिर ये सबसे सुरक्षित था, पता नहीं.”


इस सवाल का जवाब देने से पुलिस अधिकारी भी बच रहे हैं. विपक्षी दल सरकार पर संस्था की संचालक गिरिजा त्रिपाठी को संरक्षण देने और उन्हें बचाने की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन इस सवाल का जवाब उनके पास भी नहीं है कि ये संरक्षण गृह तो पिछले कई साल से चल रहा है, तब उन्हें कौन बचा रहा था?
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