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शाहजहां : जिसे अकबर और उसके हिंदुस्तान का असली वारिस कहा जाना चाहिए

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पांचवें मुगल बादशाह शाहजहां ने मुमताज़ की मौत के बाद दो साल तक ख़ुद को भोग विलास से दूर रखकर मातम मनाया था

हिंदुस्तान में मुग़लिया सल्तनत कायम करने वाला बाबर था और उसे मज़बूती देने का काम अकबर ने किया था. न हुमायूं और न ही जहांगीर उस दर्ज़ा क़ाबिल थे जितने कि ये दोनों. हां, पांचवां मुग़ल यानी शाहजहां वह शहंशाह हुआ है जिसे कई मायनों में ‘अकबर के हिंदुस्तान’ का वारिस कहा जा सकता है. यहां ‘अकबर के हिंदुस्तान’ का मतलब राज्य की सीमा, हिंदू-मुस्लिम तहज़ीब और कला-संस्कृति के उत्थान से है.

राजाओं पर लिखने में सबसे बड़ा जोख़िम होता है सही तथ्य जुटाना क्योंकि इतिहास तो हमेशा से ही संगीनों साए में और सिक्कों की खनक पर लिखे जाते रहे हैं. मौजूदा दौर के इतिहासकार बनारसी प्रसाद सक्सेना के ‘शाहजहां का इतिहास’ को काफ़ी हद तक सही माना जाता है और उसकी बुनियाद है अब्दुल हमीद लाहोरी का ‘शाहजहांनामा’. उसके हवाले से कुछ बातें यहां दर्ज़ की जा रही हैं.

अकबर की निगेहबानी में ख़ुर्रम का बचपन

पांच जनवरी, 1592 की जुमेरात (गुरुवार) को पैदा हुए जहांगीर की बेगम के बेटे पर सबसे ज़्यादा कोई ख़ुश था तो अकबर था. जहांगीर ने अकबर से उसके बेटे का नाम रखने की इल्तिजा की. अकबर ने उसे ख़ुर्रम कहकर बुलाया. फ़ारसी में ख़ुर्रम का मतलब है ख़ुशी. पैदाइश के छठवें दिन ख़ुर्रम को अकबर की बेगम रुकैया के हवाले कर दिया गया. बेगम रुकैया की संतान नहीं थी. उसने ख़ुर्रम को गोद ले लिया.

ज़िंदगी भर अनपढ़ रह जाने वाले अकबर ने ख़ुर्रम की तालीम-ओ-इल्म में कोई कोर कसर नहीं रखी. साथ ही, बढ़िया उस्तादों से उसे जंग के सबक भी दिलवाए. अकबर का 15 साल के ख़ुर्रम के लिए लगाव इतना बढ गया था कि वह उसे जंगों पर ले जाने लगा. इससे ज़ाहिर होता है कि ख़ुर्रम के ‘शाहजहां’ बनने की बुनियाद में अकबर की निगेहबानी है.

मुमताज़ से मुहब्बत

अर्जुमंद बानो यानी मुमताज़ के अलावा फ़ारस के सुल्तान शाह इस्माइल की बेटी और अब्दुल रहीम खानखाना की पोती शाहजहां की दो और बेगमें थीं. पर उसको मुहब्बत मुमताज़ से ही थी. वह उसको हर जंगी दौरे पर साथ ले जाया करता. बैम्बर गैस्कॉइन अपनी बेहद चर्चित क़िताब ‘द ग्रेट मुग़ल्स’ में लिखते हैं कि शाही फ़रमान के मसौदों पर मुमताज़ की मुहर लगती थी और शाहजहां अक्सर सल्तनत के मसलों पर उससे राय लिया करता. 1628 में शाहजहां की ताजपोशी के महज़ तीन साल बाद पंद्रहवीं संतान की जचगी के दौरान मुमताज़ की सात जून, 1631 को बुरहानपुर में मौत हो गई. शाहजहां उसे वहीं दफ़ना कर आगरा चला आया.

इतिहासकार और प्रोफ़ेसर रामनाथ ने जून 1969 में ‘द मार्ग’ मैगज़ीन में एक लेख लिखा था. उसके मुताबिक मुमताज़ के इंतेकाल के बाद शाहजहां ने पूरे दो साल तक मातम मनाया. नाथ लिखते हैं कि उस दौरान उसने न तो शाही लिबास पहने और न ही किसी शाही जलसे में शिरकत की. गैस्कॉइन भी लिखते हैं, ‘मुमताज़ की मौत के बाद शाहजहां के जीवन में खालीपन आ गया था. दो साल तक उसने जलसे, संगीत और शाही खाने से दूरी रखी.’

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