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नेपाल-भारत के बीच क्यों बढ़ी दूरी, जानें सुषमा स्वराज के काठमांडू दौरे के मायने

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नेपाल से भारत के संबंध सदियों पुराने हैं। लेकिन चीन के दखल देने के बाद भारत के साथ नेपाल के रिश्ते में तल्खी देखने को मिल रही है।

भारत और नेपाल सिर्फ पड़ोसी देश नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराना नाता है। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से दोनों देश एक दूसरे के करीबी हैं। नेपाल से भारत का रिश्ता रोटी और बेटी का है। 1950 से लेकर अब तक नेपाल में जितनी भी समस्याएं आईं भारत ने हमेशा साथ दिया। ये बात अलग है कि दोनों देशों के बीत रिश्तों में उतार चढ़ाव आते रहे हैं।1951 में जब नेपाल में राजनीतिक संकट गहराया तो तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू ने मध्यस्थता करते हुए भरपूर सहयोग दिया। नेपाल में आए महाविनाशकारी भूकंप में भारत से मिली मदद को वो कभी भूल नहीं सकता। लेकिन मधेसियों के मुद्दों पर दोनों देशों के रिश्ते में कड़वाहट आ गई। इसके साथ ही इंटरनेट के क्षेत्र में चीनी एंट्री के बाद भारतीय कंपनियों का एकाधिकार खत्म हो चुका है। नेपाल में वामदलों के सरकार में आने के बाद इस तरह की संभावना जताई जा रही है कि भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में नरमी देखने को मिल सकती है। इन आशंकाओं के बीच विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने काठमांडू का दौरा किया था।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का नेपाल दौरा

दो दिवसीय दौरे में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी, प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और सीपीएन-माओवादी सेंटर के अध्यक्ष प्रचंड से मुलाकात की। प्रचंड से मुलाकात के बाद सुषमा ने कहा कि हम राजनीतिक स्थिरता और विकास की दिशा में नेपाल का पूरा सहयोग करेंगे। जबकि प्रचंड ने कहा कि हमने हालिया चुनावों के बाद की स्थिति और नई सरकार के गठन के मसलों पर चर्चा की। मैंने सुषमा से कहा कि हम राजनीतिक स्थिरता और विकास चाहते हैं। इसके लिए हमें अपने पड़ोसियों के सहयोग की जरूरत है। इससे पहले सुषमा ने गुरुवार को सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली और मधेशी पार्टियों के कई नेताओं से भी मुलाकात की थी। ओली नेपाल के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। नेपाल में हाल में हुए संसदीय और प्रांतीय चुनावों में प्रचंड की पार्टी ने सीपीएन-यूएमएल के साथ वाम गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा था। इन चुनावों में इस गठबंधन को बड़ी जीत मिली थी।

भारत-नेपाल संबंध और मधेसी समुदाय

पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में आंतरिक उठा-पटक की वजह से दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट दिखी। नेपाल, भारत पर आरोप लगाता रहा है कि वो नेपाल के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है। मधेसी समुदाय ने अपीन कुछ मांगों को न मानने की वजह से भारत-नेपाल सीमा रर परिवहन को कई दिनों के लिये रोक दिया था। नेपाल ने इसे भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी करार दिया था। नेपाल के उस वक्त के पीएम के पी शर्मा ओली ने भारत द्वारा नेपाल के कुछ महत्वपूर्ण रास्ते पर नाकाबंदी का आरोप लगाया था। लेकिन भारत ने आरोपों का जोरदार ढंग से खंडन किया। नेपाल ने अपने तर्क में कहा था कि अगर मधेसियों द्वारा नाकेबंदी का मान भी लिया जाए तो वो कुछ दिनों के लिए जारी रह सकती है। लेकिन लंबे समय तक नाकेबंदी बिना किसी समर्थन के लिए जारी रहना संभव नहीं है।

नेपाल ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में भी उठाया था। भारत द्वारा आर्थिक नाकेबंदी या वित्तीय प्रतिबंध को किसी देश के खिलाफ पहली बार उपयोग नहीं किया था। पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। भारत ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 1946 से लेकर 1993 तक दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आर्थिक दबाव का उपयोग किया था। भारत सरकार का स्पष्ट मानना था कि भारतीय डायस्पोरा को लेकर वहां की सरकार का व्यवहार भेदभावपूर्ण रहा। 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से संचालित जैश-ए- मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा को इस हमले के लिए जिम्मेदार बताते हुए पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाया था। चीन की तरह भारत भी आर्थिक बल के प्रयोग के उपायों को वैधानिक या स्पष्ट नियमों को औपचारिक नहीं बनाया है जैसा कि अमेरिका और यूरोपीय संघ ने किया है।

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